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सम्पादकीय

मानव जीवन में सुख, शांति, संतोष, समृद्धि प्रेम और ज्ञान प्राप्त करने और प्रकृति से परमात्मा तक की यात्रा पूरी करने के लिए प्रकृति भक्त बने क्योंकि प्रकृति ही परमात्मा है

 परमात्मा ने जो सुन्दर ब्रम्हांड बनाया है|  हमारी पृथ्वी इस ब्रम्हांड का सबसे सुन्दर ग्रह है  | यह पृथ्वी परमात्मा का सबसे बड़ा वरदान है  | इस प्रकृति रुपी पृथ्वी को परमात्मा ने  प्रकृति विभिन्न नजारों से सजाया है 

मेरी प्रार्थना

प्रकृति एक ममतामयी माँ की तरह है इसे बचाओ

मैंने जब से होश संभाला है | प्रकृति के प्रत्येक नज़ारे ने मुझे प्रभावित किया है प्रकृति की प्रत्येक घटना से मै आत्मविभोर हो जाता हू | जब मै छोता था आसमा और चाट सितारों को देख कर मै अचंभित होता था | चाँद सितातो को निहारने में मुझे एक अजीब से सुख की अनुभूति होती थी | जैसे-जैसे समय बीतता गया पहाड़ो पर जाना हुआ | पहाड़ो को देखकर, नदियों को देखकर, झीलों को देखकर, हरियाली को देखकर एसा महसूस होने लगा की परमात्मा यही कही छुपा हुआ है | पता नहीं कब सामने आ जायेंगा और मै उस हरियाली के सुन्दर नजारों में अपने परमात्मा को ढूढने लगता था | प्रकृति से ये प्यार, प्रकृति पर ये विश्वाश लगातार बढ़ता ही गया | बहुत सी पुस्तके पढने के बाद, कथाये सुनने के बाद, देवी-देवताओ का भी प्रकृति प्रेम जाने के बाद, प्रकृति ने किस प्रकार कदम कदम पर देवताओ का साथ दिया है |

 

प्रकृति वन्दना

ब्रम्हांड में बसे हो तुम, जगत के मुरारी

प्रकृति की हर छटा में है छवि तुम्हारी

ज्ञान की जोत जिसने भी जला ली

बुद्धि की जो गया पुजारी

उसी ने तुम्हारी है सुरतिया निहारी

क्रोध, अहंकार, लोभ का त्याग जिसने भी किया है

ज्ञान ने हमेशा साथ उसका दिया है |

प्रेम, त्याग, तपस्या का साथ जिसने भी दिया है |

प्रकृति ने सुख से मालामाल  उसको किया है |

उसे जानना उसे मानना यही नियति है हमारी

ब्रम्हांड में  बसे हो तुम, जगत के मुरारी

मोह, माया, भय का प्रसाद  उसके चरणों में चढ़ा दो

श्रद्वा और प्रेम की झोली फिर अपनी फैला दो

हर मनोकामना पूर्ण हो जाएँगी तुम्हारी

प्रकृति में छुपा बैठा है

वो जगत का मुरारी |

आओ बनाए प्रकृति माँ का मंदिर

आओ हम सब मिलकर बनाए प्रकृति का मंदिर | जिसमे सभी समुदायों के देवी – देवता विराजमान हो | जहां भाषा, धर्म, जाती के नाम पर कोई भेद न हो, जिस मंदिर में अपनी बुरईयों को प्रसाद के रूप में प्रकृति रुपी परमात्मा को भेट किया जाये और फल के रूप में प्रकृति हमें सुख शांति, संतोष, प्रेम और ज्ञान का आशीर्वाद प्रदान करे | यही सच्चा मानव धर्म है | प्रकृति की सेवा परमात्मा सेवा  है, ज्यों ही हमारे मस्तिष्क में ये ज्ञान जागृत होगा पुरे संसार में फैला भ्रष्टाचार, व्यभिचार, आतंकवा, लोभ, क्रोध, अहंकार व कामवासना निकल भागेंगे | धीरे-धीरे हमारा मस्तिष्क प्रकृति को जानने और मानाने लगेगा | हम भी देवी देवताओ की तरह प्रकृति को संवारने में लग जायेंगे | इस सेवा तपस्या भाव से परम आनंद की प्राप्ति होती होगी |

प्रकृति के नियमो से छेड़छाड़ परमात्मा के प्रति घोर अपराध है |

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